ENVIRONMENT -
खामोश खड़े हुए, वनो की भाषा, - न समझ आती, जीने की परिभाषा |
फिर भी, हर मौसम खुशहाल रहते, - न शिकवा, न शिकायत, कभी कुदरत से करते |
दिन पर दिन, बढ़ती जाती है सीमाएँ, - न खबर न पता, कब बन जाती हैं, - जीवन की भूमिकाएँ
|
साथ रहकर भी, अनजाने हैं, - न जाने कब तक, - कस्म - कश में रहेंगे,
आनांदमई पल को, बराबर कोसते रहेंगे |
सदा लदा पहाड़, न मौज को छुपता हैं, - हर ऋतू के आगमन को, स्वयं ही दर्शाता हैं |

nice poem sir
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