जब पौधों से पछूा, हरियाली का राज़ |
बोले झूमकर, क्या बात है आज |
कुछ सुस्त, कुछ दरुुस्त, नज़र आते हो |
मौसम की खुमार से, खुद को बचाते हो |
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं, पर यूँ ही,
खुद को याद आया, वो बीते हुए पल,
और गुजरी हुई हाया |
गीत अब भी, गुनगुना लेता हूँ |
क्या छुपाऊअब, लेकिन बयां, नहीं कर पाता |
क्यूंकि, समय के बहाव में,
न जाने किस कदर, बिखर गए हैं अरमान,
दर-बदर, दर-बदर |

super sir. very nice.
ReplyDeleteReally Nice Poem
ReplyDeleteSir