काँटों तले सुमन को, देखा इस कदर,
उमड़ पड़ी चेतना, बढ़ने को बेफिकर |
उमड़ आई साहस की, ऐसी एक लहर,
न बढ़ते हुए पग ने, ढूंढा एक डगर |
चलते रहना और, तन्हाइयों को पीछे छोड़ना,
हुनर एक ऐसी आई, सीख ली जीवन की शैली, जो मन को रास आई |
हर क्षण, हर पल खुद में, रहता एक विश्वास,
सीखा फिर भूलकर, जीने की नई आश |
यूाँ तो सारी उम्र, सीखते ही रहना है |
बहती धरा की तरह, समय के साथ, नीकल जाना है |

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