सदियों से चला आ रहा, बुराइयों का प्रतीक है,
इसका अलग स्वाभाव हीं, वर्षों का अतीत है |
सभी जगह फैला हुआ, करता काम अजीब है,
नारी का अपमान है भरता, रहता एक परजीव है |
हमेशा से निंदा पात्र, माना गया है इसे,
फिर भी मानव वर्ग इसे, पूछता आया है ख़ुशी से |
नारियों को बोझ समझकर, इसे चुकाना पड़ता है,
खुद कर्ज तले दबकर, जीवन बिताना पड़ता है |
समझ गए गर इसका रहना, कितना हीं अभिशाप है,
समाज को नष्ट करना, इसका मूल अभिलाष है |

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