पिता, एक अद्भुत
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खुद कठिन हालात को, रहता है निभाता, देकर मुस्कान
लवों को, सदैव है
निहारता | घर का मुखिया
रहकर, हर कर्म
निभाता, मानवता एक
अलग पहचान, सिखाता परिवार
जन को, |
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पिता की
एक अलग
भूमिका, रहती सदा
कठोर है, गढ़ता बालपन
को, होता दूर
दोष है, पाल पोश कर
बड़ा करता, अपने इस
अलाव को, |
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हर क्षण आशीष देता, अपने इस माया को, हर पल बचाये रखता, कठोरता से काया को | पाता फिर
जीवन का
सुख, होती आत्मा
फिर विभोर, समय की चपेट
में आकर, माया है
रंग लाती, |
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बड़े होकर सादगी को, पलभर में भूल जाते, लाकर तनाव
अपनों में, कलह का
भाग्य जगाते
| अगर संस्कार आये
तो, काफी भाग्यशाली
बन जाता, बन पहरेदार परिवार
का, जगत की
रीत जताता, |



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