बढ़ते कदम -
नयी चाह, नयी राह, जीवन एक प्रवाह,
चलते जाना, अपने आप, जैसे सरिता का बहाव |
न सड़क, न डगर, फिर भी बहना मगर,
न रुकना, न थकना कभी, रास्ता निकाल लेना वहीं |
अपने आप में रमना, यही है बस खाश |
जीवन में बस बहते जाओ, नहीं कहीं थकान लाओ,
हर तरफ है बस स्वार्थ, न करो तुम फिर विश्वाश |

No comments:
Post a Comment