चारो ओर फ़ैल रही, अज्ञानता की आग,
न जाने कब लौटेगी, जो चेतना गई है भाग |
दिखावे पे चलते लोग, खो दिए हैं ज्ञान,
ताम में रहने की मानो, निकाल पड़े हैं ठान |
डूबती विकास की नैया, खुद ही बने है खेवैया,
न सोच न समझ आता, फिर भी मन है पछताता |
भटकते फिर रहे हैं डगर, नहीं आ रही इन्हें नजर,
जब अज्ञानता जाएगी, रौशनी की ब|री आएगी,
तब होगा समय की मार, क्यों रोये देख अपनी हार |

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