हिना की कहानी -
हीना जब रंग लाती, हाथो, बालो को,
खूब सजाती, सुंदरता की जय होती,
खुद छुपकर वो मुस्कुराती |
कुदरत के कितने रंग, मानो तो उपकार,
वर्ना रंग में भंग, रंग में भंग |
सदियों से ही इसने, इतने उपकार पाले,
आज भी इसके आगे, सभी रंग हैं भागे | हर खुशी में, हर घरो में,
खूब तरासी जाती, इतनी इसकी कला,
बाज़ारों में बिकी जाती |

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