प्रकृति का सम्मान -
आवाज़ सुनते ही मैंने, जब खुद दौड़ लगाई,
पहुँचते ही मंजिल तक, अजीब सी आवाज़ आई |
कुछ रोते-विलकते, तो कुछ खुद ही, अपनों को ढूंढते |
ना जाने इस मंजर में, कौन किधर गया,
पानी के बहाओ में, सब मिट गया |
प्रकृति का यह खेल निराला, ना समझ आया ये बाला,
कही-कही छटा बिखेरती, कभी हटकर यह डाला |
प्रकृति का सम्मान, सदा कहे भगवान,
वर्ना तू कहाँ, पूरी दुनिया सुनसान |

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